तुम्हारी
हसरतों का
एक पिटारा है
मेरे पास
जो खुलता रहता है
जब और तब।
मालूम है तुम्हें
इन हसरतों का
मेरी चाहतों से
कोई वास्ता नहीं,
किसी सपेरे के पिटारे
के मानिंद
हसरतें सिर उठाती रहती हैं
नागफनियों की तरह,
और तैयार रहती हैं हमेशा
डसने को
नहीं तो कम से कम
भय तो पैदा ही करती हैं
डसे जाने का।
किसी बच्चे की मानिंद
मैं भी छिटककर दूर
खड़ा हो जाता हूं
बढ़ी हुई धड़कनों के साथ
और जब पिटारा
बंद होता है
तो आ खड़ा होता हूं
फिर से
तुम्हें समझने की उत्सुकता में
हसरतों के दोबारा
बाहर आने तक।
--------------------@ प्रदीप
एक पिटारा है
मेरे पास
जो खुलता रहता है
जब और तब।
मालूम है तुम्हें
इन हसरतों का
मेरी चाहतों से
कोई वास्ता नहीं,
किसी सपेरे के पिटारे
के मानिंद
हसरतें सिर उठाती रहती हैं
नागफनियों की तरह,
और तैयार रहती हैं हमेशा
डसने को
नहीं तो कम से कम
भय तो पैदा ही करती हैं
डसे जाने का।
किसी बच्चे की मानिंद
मैं भी छिटककर दूर
खड़ा हो जाता हूं
बढ़ी हुई धड़कनों के साथ
और जब पिटारा
बंद होता है
तो आ खड़ा होता हूं
फिर से
तुम्हें समझने की उत्सुकता में
हसरतों के दोबारा
बाहर आने तक।
--------------------@ प्रदीप
वाह .. अति सुन्दर
ReplyDeleteउत्कृष्ट लेखन हेतु शुभकामनाएं ...
शुक्रिया प्रवीण शुक्ल जी
ReplyDeletebahut sundar boss
ReplyDeleteवाह ..वाह ..
ReplyDeleteशुक्रिया अजय भाई
Deleteशुक्रिया हिंमाशू जी
ReplyDeleteउत्सुकता ... कैसे बहाना कर सो जाती है (भय तो पैदा ही करती हैं
ReplyDeleteडसे जाने का। )
और फिर कैसे सोते हुए भी ... सपनों में जागती रहती है (तो आ खड़ा होता हूं
फिर से )
शब्दों में चित्रण कोई आपसे सीखे ..
शुक्रिया प्रातिभ जी
Deleteअति सुंदर लेखनी है आपकी. इसको लिखने के पहले तो नही पर बाद में आपको सुकून जरुर मिला. आपकी इस रचना से कुछ ख़ास लगाव महसूस होता है...
ReplyDelete
ReplyDeleteशुक्रिया पूर्णिमा जी