Wednesday, July 17, 2013

स्त्री-1



साभार oddstuffmagazine.com


















सुनो 
कहो 
कुछ बात है 

कुछ तो नहीं 
आज गजब ढा रही हो
और तुम चुप रहीं। 

चलो 
नहीं
क्यों
बस ऐसे ही
फिर कभी मत आना
और तुम सहम गईं। 

मैं फिर आया
तुम्हें राहत मिली
अभी भी नहीं
और तुम कुछ नहीं बोलीं

मैंने कहा, ऐसे
और तुम वैसे
मैंने कहा, ऐसे नहीं ऐसे
और तुम वैसे ही

मैं कहता गया
तुम करती गईं
हर बार
अपनी आत्मा का दम घोंटकर

क्योंकि मैं पुरूष था
तुम स्त्री। 
------------@ प्रदीप

4 comments:

  1. मानवीय भावनाओ की ये अभिव्यक्ति ...बताती है कि .. आप शब्दों के बेबाक सम्प्रेषण में विश्वास रखते है
    इसके लिए साहस भी चाहिए और एक संवेदनशील व्यक्तित्व भी

    बहुत उम्दा !!!

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    1. शुक्रिया प्रातिभ जी

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  2. बहुत खूब. बहुत गहराई है इस रचना में. चाहूगी की स्त्री की और भी कड़िया भी जल्द हमारे सामने आये.

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    1. शुक्रिया पूर्णिमा जी

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