Sunday, July 7, 2013

नागफनियां

तुम्हारी 
हसरतों का 
एक पिटारा है 
मेरे पास 
जो खुलता रहता है
जब और तब। 
मालूम है तुम्हें
इन हसरतों का
मेरी चाहतों से
कोई वास्ता नहीं,
किसी सपेरे के पिटारे
के मानिंद
हसरतें सिर उठाती रहती हैं
नागफनियों की तरह,
और तैयार रहती हैं हमेशा
डसने को
नहीं तो कम से कम
भय तो पैदा ही करती हैं
डसे जाने का।
किसी बच्चे की मानिंद
मैं भी छिटककर दूर
खड़ा हो जाता हूं
बढ़ी हुई धड़कनों के साथ
और जब पिटारा
बंद होता है
तो आ खड़ा होता हूं
फिर से
तुम्हें समझने की उत्सुकता में
हसरतों के दोबारा
बाहर आने तक।
--------------------@ प्रदीप

10 comments:

  1. वाह .. अति सुन्दर
    उत्कृष्ट लेखन हेतु शुभकामनाएं ...

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  2. शुक्रिया प्रवीण शुक्ल जी

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    1. शुक्रिया अजय भाई

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  4. शुक्रिया हिंमाशू जी

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  5. उत्सुकता ... कैसे बहाना कर सो जाती है (भय तो पैदा ही करती हैं
    डसे जाने का। )
    और फिर कैसे सोते हुए भी ... सपनों में जागती रहती है (तो आ खड़ा होता हूं
    फिर से )
    शब्दों में चित्रण कोई आपसे सीखे ..

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    1. शुक्रिया प्रातिभ जी

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  6. अति सुंदर लेखनी है आपकी. इसको लिखने के पहले तो नही पर बाद में आपको सुकून जरुर मिला. आपकी इस रचना से कुछ ख़ास लगाव महसूस होता है...

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  7. शुक्रिया पूर्णिमा जी

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