Wednesday, July 17, 2013

स्त्री-1



साभार oddstuffmagazine.com


















सुनो 
कहो 
कुछ बात है 

कुछ तो नहीं 
आज गजब ढा रही हो
और तुम चुप रहीं। 

चलो 
नहीं
क्यों
बस ऐसे ही
फिर कभी मत आना
और तुम सहम गईं। 

मैं फिर आया
तुम्हें राहत मिली
अभी भी नहीं
और तुम कुछ नहीं बोलीं

मैंने कहा, ऐसे
और तुम वैसे
मैंने कहा, ऐसे नहीं ऐसे
और तुम वैसे ही

मैं कहता गया
तुम करती गईं
हर बार
अपनी आत्मा का दम घोंटकर

क्योंकि मैं पुरूष था
तुम स्त्री। 
------------@ प्रदीप

हाइकू

प्रिय नयन
कहीं देखा क्या कभी
घोर सन्नाटा।

हे प्रिय कर्ण
कभी सुनी क्या कहीं
चिर खामोशी।

ओ रे अधर
कुछ कहा क्या कभी

मेरे दिल का।

ओ मेरे मन
कभी कुछ सोचा क्या
खुद से जुदा।
-----------@प्रदीप

हाइकू का संक्षिप्त परिचय----- हाइकू मूलत: जापानी साहित्य की प्रमुख विधा है। इसे अनुभूति के चरम क्षण की कविता भी कहते हैं। देखने में आसान होने के बाद भी इसका शिल्प कौशल जटिल है। हाइकू अनुशासन प्रिय काव्य विधा है। हाइकू कविता को भारत में लाने का श्रेय कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर को जाता है। हाइकू सत्रह (१७) अक्षर में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ और तीसरी में ५ अक्षर रहते हैं। संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है। तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात एक ही वाक्य को ५,७,५ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों। हाइकु के लिए गंभीर चिंतन, एकाग्रता और अनुभूति को पचाकर उसे अभिव्यक्त करने के लिए पर्याप्त धैर्य चाहिए।

Sunday, July 7, 2013

नागफनियां

तुम्हारी 
हसरतों का 
एक पिटारा है 
मेरे पास 
जो खुलता रहता है
जब और तब। 
मालूम है तुम्हें
इन हसरतों का
मेरी चाहतों से
कोई वास्ता नहीं,
किसी सपेरे के पिटारे
के मानिंद
हसरतें सिर उठाती रहती हैं
नागफनियों की तरह,
और तैयार रहती हैं हमेशा
डसने को
नहीं तो कम से कम
भय तो पैदा ही करती हैं
डसे जाने का।
किसी बच्चे की मानिंद
मैं भी छिटककर दूर
खड़ा हो जाता हूं
बढ़ी हुई धड़कनों के साथ
और जब पिटारा
बंद होता है
तो आ खड़ा होता हूं
फिर से
तुम्हें समझने की उत्सुकता में
हसरतों के दोबारा
बाहर आने तक।
--------------------@ प्रदीप